बालक ने जहाज डूबने से बचाया

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बालक ने जहाज डूबने से बचाया
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एक समय समुद्र में भयानक तूफान आनेके कारण किनारेसे थोड़ी दूरतक आया हुआ एक जहाज डूबनेकी तैयारीमें था। उसके मुसाफिरों तथा नाविकोंको बचानेके लिये किनारेसे नाव का जाना जरूरी था; परंतु उसको चलानेके लिये आदमी की जरूरत थी। किनारेपर एक लड़का खड़ा था, उसे यह देखकर दया आ गयी और वह उस नाव पर जाने के लिये तैयार हो एक और गया।

उस समय उसकी माँ भी वहीं खड़ी थी। लड़केने अपनी माँ से कहा -‘माँ! मैं इस नौका को सहायता दूँ ? उस जहाज के लोग तभी बच सकेंगे, जब नाव वहाँ पहुँच जायगी।’

बालक की यह बात सुनकर मां के मन में बड़ा मोह आ गया; क्योंकि इस बालक के पिता छः महीने पहले नाव में बैठकर समुद्र में गया था और फिर अबतक लौटकर नहीं आया। लोगोंने समझ लिया कि वह मर गया होगा। इस बालक के सिवा उस स्त्री को दूसरा कोई आधार न था। उसने सोचा कि ‘यदि बालक को भी कुछ हो गया तो मेरा कोई भी सहारा न रह जायगा।’ यों विचार करते-करते उस स्त्री की दृष्टि जहाज की ओर गयी। देखती क्या है कि उसके आदमी बड़ी आतुरतासे नावकी बाट देख रहे हैं और जहाज में पानी अधिक-अधिक भरता जा रहा है।

इससे उसने विचारा कि ‘इन सब लोगोंका घर भी दूर होगा और इन सबके कितने अधिक संगी-साथी, पत्नियाँ, लड़के, माँ-बाप और बहनों को बड़ा कष्ट पहुंचाना। मेरा बच्चा नाव डूबनेसे यदि मर जायगा तो इससे केवल मेरा नुकसान होगा और मैं किसी भी प्रकार अपना गुजारा कर लेंगे। इसलिये इन सब लोगोंके सगे-साथियोंके अहित होनेकी अपेक्षा मुझ अकेलीका अहित होना अच्छा होगा । ऐसा विचारकर उसने लड़केसे कहा-‘मेरे बेटे ! तू जा, परमात्मा तुझे जीता-जागता रहे।

इसके बाद वह बालक नावमें बैठा और थोड़ी ही देरमें डूबते हुए जहाज के पास जा पहुंचा। जहाज के सब लोगोंके प्राण बच गये। दैवयोगसे उसी जहाजपर उस बालकका पिता भी था। उस बालकने और उसके साथकी नौकाके खलासियोंने उसको पहचाना । बालकने उससे पूछा-‘इतने दिनोंतक तुम कहाँ थे ? हमलोगोंने तो समझा था कि तुम मर गये होंगे।

इसके उत्तरमें बालकके पिताने कहा-‘समुद्र में बड़ा तूफान आनेसे मेरी नाव उलट गयी; पर इतनेमें एक पटरा हाथ लगा और उसका आधार लेकर मैं तैरने लगा। उस किनारे एक जहाज जाता था। उसपरके आदमियोंने मुझे देखा और उन्होंने मुझे ऊपर ले लिया। वह जहाज अफ्रीका पहुँचा और वहाँसे यह जहाज चला। इसपर बैठकर मैं घर आ रहा था, इतनेमें फिर पीछेसे तूफान आ गया और तुम यह नाव लेकर आये।’

इसके बाद अपने लड़केके साथ वह घर गया। लड़केने माँ से कहा -‘देखो माँ ! तूने मुझे नावमें जानेकी आज्ञा दी तो मेरे पिताजी भी बच गये !’ वह स्त्री अपने स्वामीको देखकर बहुत ही प्रसन्न हुई और ईश्वर का उपकार मानने लगी। वह बालक दूसरे लोगोंका प्राण बचाने गया था, उसका फल उसे कैसा अच्छा मिला। अच्छा काम करनेवालेका ईश्वर सदा भला करता है।

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