दयालु और बुद्धिमान विट्ठल की कहानी

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दयालु और बुद्धिमान विट्ठल की कहानी
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एक बार एक बड़े शहरमें एक घरमें आग लगी और देखते-देखते आस-पासके घरों में भी फैल गयी। घरके आदमी बड़ी कठिनाईसे बाहर निकल सके और अपना-अपना माल बचानेमें लग गये कुछ देरके बाद आग बुझानेवाली दमकल भी आ गयी।

एक घरमें सीढ़ीमें आग लग जानेके कारण तीन आदमी निकलनेका बहुत उपाय करनेपर भी न निकल सके। अन्तमें वे रास्तेके ऊपरके किनारेपर आये। वहाँसे कूदते तो उनके प्राण तुरंत ही चले जाते। रास्तेमें खड़े लोगोंने उनको देखा तो सही, पर इतनी लम्बी सीढ़ी न होनेके कारण वे निरुपाय हो गये उन तमाशा देखनेवाले लोगोंमें एक बिट्टू नाम का बारह तेरह वर्ष की उम्र का जूता साफ करनेवाला लड़का था। उस लड़केने यह करुणाजनक दृश्य देखा और इधर-उधर नजर दौड़ायी। उसने रास्तेपर एक तारका खंभा खड़ा देखा।

जलते घर के छप्पर में एक हुक मारकर तारका एक छोर वहाँ बैंधा था। यदि खंभेवाला छोर काट दिया जाता तो तार सीधे मकान के किनारे जमीनकी ओर लटक जाता। इसलिये तुरंत इधर-उधर देखकर आग बुझानेवालोंकी रास्तेमें पड़ी एक कुल्हाड़ी उसने उठा ली और उसे साथ लेकर तुरंत वह खंभेपा चढ़ गया तथा थोड़ी ही देरमें तारके छोरको काट डाला। ताथं काटे जानेपर वह घरकी छतसे नीचेकी ओर लटक गया और उसको पकड़कर एक-एक करके तीनों आदमी तुरंत ही नीचे उतर आये।

विट्ठलकी यह समयानुसार सूझ और दया से भरा हुआ काम देखकर लोगोंको बहुत ही आनन्द हुआ और उसको लोग शाबाशी देने लगे। उसके बाद उतरे हुए दोनों आदमियों ने उसको इनाम दिया और उस लड़केका उपकार माना। तुरंत ही अखबार में उसका चित्र छपवाया गया और उसके कामकी बड़ी प्रशंसा की गयी।

देखो, बारह-तेरह वर्ष का बहुत ही गरीब लड़का भी किस प्रकार तीन आदमियों के प्राण बचा सका। मनुष्य चाहे कितना ही गरीब क्यों न हो, वह चाहे तो परोपकार का सुंदर काम अवश्य कर सकता है। यह बात इस उदाहरण से बहुत अच्छी तरह समझमें आ सकती है।

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