शिव स्तुति शिव वंदना भावार्थ सहित राग रामकली

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Shiv Shiv Ling Hindu Hinduism  - murthysnraj / Pixabay

जाँचिये गिरिजापति कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥१॥
औढर-दानि द्रवत पुनि थोरें। सकत न देखि दीन करजोरें ॥२॥
सुख-संपति, मति-सुगति सुहाई। सकल सुलभ संकर-सेवकाई ॥३॥
गये सरन आरती कै लीन्हे। निरखि निहाल निमिष महुँ कीन्ह ॥४॥
तुलसीदास जातक जस गावै । बिमल भगति रघुपति को पावै ॥५॥

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भावार्थ-पार्वती पति शिवजी से ही याचना करनी चाहिए, जिनका घर काशी है और अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठों सिद्धियाँ जिनकी दासी हैं ॥१॥ शिवाजी महाराज औढरदानी हैं, थोड़ी-सी सेवासे ही पिघल जाते हैं । वह दीनोंको हाथ जोड़े खड़ा नहीं देख सकते, उनकी कामना बहुत शीघ्र पूरी कर देते हैं ॥ २ ॥ शंकरकी सेवासे सुख, सम्पत्ति, सुबुद्धि और उत्तम गति आदि सभी पदार्थ सुलभ हो जाते है ॥ ३ ॥ जो आतुर जीव उनकी शरण गये, उन्हें शिवजी ने तुरंत अपना लिया और देखते ही पलभरमें सबको निहाल कर दिया ॥ ४ ॥भिखारी तुलसीदास भी यश गाता है, इसे भी रामकी निर्मल भक्तिकी भीख मिले !॥ ५ ॥

कस न दीनपर द्रव उम्र। दारुन बिपति हरन करुनाकर ॥१॥
बेद-पुरान कहत उदार हर । हमरि बेर कस भयहु कृपिन तर ॥२॥
कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज । होइ प्रसन्न दीन्ही हो सिव पद निज । ३॥
जो गति अगम महामुनि गावहिं । तव पुर कीट पतंग पावहीं ॥४॥
देहु काम-रिपु ! राम-चरन-रति । तुलसिदास प्रभु!हरहु भेद-मति ॥५॥

भावार्थ-हे उमा-रमण ! आप इस दीनपर कैसे कृपा नहीं करते? हे करुणाकी खानि ! आप घोर विपत्तियोंके हरनेवाले हैं ॥ १ ॥ वेद-पुराण कहते हैं कि शिवजी बड़े उदार हैं, फिर मेरे लिये आप इतने अधिक कृपण कैसे हो गये?॥ २ ॥ गुणनिधि नामक ब्राह्मण ने अपनी कौन-सी भक्ति की थी, जिसपर प्रसन्न होकर आपने उसे अपना कल्याणपुर दे दिया॥ ३ ॥ जिस परम गतिको महान् मुनिगण भी दुर्लभ बतलाते हैं, वह आपकी कानपुर में कीट-पतंगोंको भी मिल जाती है॥४॥ हे कामारि शिव ! हे स्वामी !! तुलसीदास के भेद-बुद्धि हरणकर उसे श्रीरामके चरणोंकी भक्ति दीजिये ॥ ५

देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोले।
किये दूर दुख सबनिके, जिन्ह-जिन्ह कर जोरे ॥१॥
सेवा, सुमिरन, पूजिबौ, पात आखत थोरे ।
दिये जगत जहँ लगि सबै, सुख, गज, रथ, घोरे ॥२॥
गाँव बसंत कामदेव, मैं कबहूँ न निहोरे ।
अधिभौतिक बाधा भई, ते किंकर तोरे ॥३॥
बेगि बोलि बलि बरजिये, करतूति कठोरे ।
तुलसी दलि, रूँध्यो चहैं सठ साखि सिहोरे ॥४॥

भावार्थ-हे शंकर ! आप बड़े देव हैं, बड़े दानी हैं और बड़े भोले हैं जिन-जिन लोगोंने आपके सामने हाथ जोड़े, आपने बिना भेद-भावके उन सब लोगोंके दुःख दूर कर दिये॥ १ ॥ आपकी सेवा, स्मरण और पूजनमें तो थोड़े-से बेलपत्र और चावल से ही काम चल जाता है परन्तु इनके बदलेमें आप हाथी, रथ, घोड़े और जगत्में जितने सुखके पदार्थ हैं, सो सभी डालते हैं।। २ ॥ हे कामदेव ! मैं आपके गाँव (काशी) में रहता हूँ, मैंने कभी आपसे कुछ माँगा नहीं, अब आधिभौतिक कष्टके रूपमें ये आपके किंकरगण मुझे सताने लगे हैं। ३॥ इसलिये आप इन कठोर कर्म करनेवालोंको जल्दी बुलाकर डाँट दीजिये, मैं आपकी बलैया लेता हूँ, क्योंकि ये दुष्ट तुलसीदास रूपी तुलसी के पेड़ को कुचलकर उसकी जगह शाखोट (सहोर) के पेड़ लगाना चाहते हैं I४॥

सिव ! सिव! होइ प्रसन्न करू दाया।
करुनामय उदार कीरति, बलि जाउँ हरहु निज माया ॥१॥
जलज-नयन, गुन-अयन, मयन-रिपु, महिमा जान न कोई।
बिनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनेहुँ भगति न होई। ॥२॥
रिषय, सिद्ध, मुनि, मनुज, दनुज, सुर, अपर जीव जग माहीं।
तव पद बिमुख न पार पाव कोउ, कलप कोटि चलि जाहीं ॥३॥
अहिभूषन, दूषन-रिपु-सेवक, देव-देव,त्रिपुरारी।
मोह-निहार-दिवाकर संकर, सरन शोक-भयहारी ॥४ ॥
गिरिजा-मन-मानस-मराल, कासीस, मसान-निवासी।
तुलसीदास हरि-चरन-कमल-बर, देहु भगति अबिनासी ॥५॥

भावार्थ-हे कल्याणरूप शिवजी! प्रसन्न होकर दया कीजिये। आप करुणामय हैं, आपकी कीर्ति सब ओर फैली हुई है, मैं बलिहारी जाता हूँ, कृपापूर्वक अपनी माया हर लीजिये ॥ १ ॥ आपके नेत्र कमलके समान हैं, आप सर्वगुणसम्पन्न हैं, कामदेव के शत्रु हैं। आपकी कृपा बिना न तो कोई आपकी महिमा जान सकता है और न श्रीरामके चरणकमलोंमें स्वप्न में भी उसकी भक्ति होती है । २ ॥ ऋषि, सिद्ध, मुनि, मनुष्य, दैत्य, देवता और जगत्में जितने जीव हैं, वे सब आपके चरणोंसे विमुख रहते हुए करोड़ों कल्प बीत जानेपर भी संसार-सागरका पार नहीं पा सकते ॥ ३ ॥ सर्प आपके भूषण हैं, दूषणको मारनेवाले (और सारे दोषोंको हरनेवाले) भगवान् श्रीरामके आप सेवक हैं, आप देवाधिदेव हैं, त्रिपुरासुर का संहार करनेवाले हैं। हे शंकर! आप मोहरूपी कोहरेका नाश करनेके लिये साक्षात् सूर्य हैं, शरणागत जीवोंका शोक और भय हरण करनेवाले हैं॥४॥ हे काशीपते ! हे श्मशाननिवासी !! हे पार्वतीके मनरूपी मानसरोवरमें बिहार करनेवाले राजहंस !!! तुलसीदास को श्रीहरिके श्रेष्ठ चरणकमलोंमें अनपायिनी भक्ति का वरदान दीजिए॥ ५

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