श्रद्धा और अंधश्रद्धा में क्या अंतर होता है जानिए संत और शिस्य की कहानी

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photo of a lighted candle

जीवन मैं श्रद्धा होना क्यों महत्वपूर्ण है

अक्सर हमें यह निर्णय लेने में कठिनाई होती है की किसी श्रद्धा कहा जाए और किसे अंध श्रद्धा या अंधविश्वास कहा जाए अगर हम किसी ऐसे व्यक्ति पर श्रद्धा करते हैं जो श्रद्धा का पत्र ना हो तो लोग हमें अंधविश्वासी कहते हैं अगर हम किसी ऐसे सिद्धांत पर श्रद्धा रखते हैं जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है तो लोग ऐसे अंदर अंधश्रद्धा कहते हैं दरअसल कोई सिद्धांत वैज्ञानिक है या नहीं है यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं हूँ अगर उस सिद्धांत पर श्रद्धा रखने से हमारा जीवन वैज्ञानिक होता जा रहा हूँ अगर उस श्रद्धा के कारण हम रूपांतरित होते जा हों अगर वह श्रद्धा हमें शुभ और सत्य की दिशा में गतिमान करती हूँ तो उसे श्रद्धा कहा जाता है यदि कोई सिद्धांत कितना ही वैज्ञानिक हो लेकिन उस पर श्रद्धा रखने से हमारा जीवन रूपांतरित नहीं होता हूँ हमारी उन्नति रुख़ जाती हो या वह हमारी जीवन को पतन की ओर ले जाती हूँ तो उसे अंधविश्वास या अश्रद्धा कहा जाता है दरअसल श्रद्धा है या अंध श्रद्धा करने वाले पर निर्भर होती है जिस पर हमारा विश्वास है वह महत्वपूर्ण नहीं है निर्णायक नहीं है हमारा विश्वास हमारे लिए क्या करता है यही महत्वपूर्ण और निर्णायक है

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जानिए कहानी संत और शिस्य एवं श्रद्धा और अंधश्रद्धा की

एक परम श्रद्धालू सन्त थे जो हर किसी व्यक्ति पर भरोसा कर लेते थे। एक बार वे अपने प्रिय शिष्य के साथ यात्रा पर थे। यात्रा के दौरान जो भी व्यक्ति उनके साथ हो लेता वे उसे अपने साथ
रख लेते | अक्सर साथ होने वाले व्यक्ति एक रात उनके साथ रुकते और सुबह उनका सामान चोरी
करके भाग जाते। उनका शिष्य जब बहुत परेशान हो गया तो अपने गुरु से बोला- आप तो हर
किसी पर श्रद्धा कर लेते हैं और फिर नुकसान उठाते हैं। इतने आदमी धोखा दे गये फिर भी आपका
आदमी पर से भरोसा नहीं उठ रहा है। वे सन्त बोले- ये सब मेरी श्रद्धा की परीक्षा ले रहें हैं। अगर
ऐसे लोग मेरे साथ ठहरें जो भले हों तो फिर मेरी श्रद्धा के लिए कोई भी कसौटी नहीं रह जाएगी।
फिर जो सामान चोरी गया उसकी तो कोई कीमत नहीं है लेकिन उसके साथ श्रद्धा भी अगर चली द
जायेगी तो बड़ा कीमती नुकसान हो जाएगा। मैं आदमी पर भरोसा इसलिए नहीं छोड़ रहा हूं
क्योंकि सवाल आदमी का नहीं, सवाल मेरी श्रद्धा का है। सवाल यह नहीं है कि आदमी पर मेरी श्रद्धा हो बल्कि सवाल यह है कि मेरे अन्दर श्रद्धा हो और अगर मैं आदमी पर भरोसा नहीं कर
सकता तो फिर मैं किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकूंगा। अन्त में वे सन्‍्त अपने शिष्य से बोले-
मेरी दृष्टि में वे लोग तुझे ज़्यादा नुकसान पहुंचा रहें हैं क्योंकि चोरी गये सामान की तो बड़ी कीमत
नहीं है पर तेरी अति मूल्यवान श्रद्धा नष्ट होती जा रही है

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